'भाग्य बड़ा है या पुरुषार्थ ? 

 प्रबल पुण्योदय पर सेठ की बात 

अगर शुभ कार्य का प्रबल उदय हो तो उसमे कोई बाधक नहीं बन सकता ।

एक सेठ था।उसे अपना भविष्य जानने की इच्छा हुई,। वह ज्योतिषी के पास गया। ज्योतिषी ने कुंडली देखकर कहा-"सेठजी ! आपके ग्रह बहुत अच्छे हैं, उल्टा डालो तो भी सीधा पड़े, ऐसा है !"

ग्रह कुछ नहीं करते, वे तो मात्र सूचना देने वाले हैं। करने वाले तो पूर्व-कर्म हैं। सेठ समझ गया कि, उसके भाग्य का उदय है। इसलिए परीक्षा के लिए, राजा की सभा में गया। सबसे ज्यादा खतरा और कष्ट सह लेने का स्थान तो राजदरबार ही है न ! वह राजसभा में पहुंचा। राजा सिंहासनपर बैठा हुआ था। राजा के निकट जाकर उसने राजा को एक थप्पड़ लगाया और उसका मुकुट गिरा दिया। कहिए, आपको अपने भाग्य पर है, इतना भरोसा ? अगर हो तो क्या धर्मकार्य मे कृपण बनें ? सुपात्र को सौ के बनाय हजार का दान क्यो न दें ? जितना दान करे उतना लाभ हो, लेकिन विश्वास कहाँ है ? सिपाहियों ने जब वह नजारा देखा तो वे दौडे आये और म्यान से तलवार निकाल ली l लेकिन, वह तलवार सेठ की गरदन पर पड़े, उससे पहले ही, पुण्य के जोर से, सारा मामला ही बदल गया। नीचे पड़े हुए मुकुट पर राजा की दृष्टि पड़ी, तो उसमे उसे एक छोटा लेकिन भयंकर सॉप दिखायी पड़ा  राजा को लगा-'अहो ! अगर यह उपकारी न आया होता, तो क्या होता? राजा ने सिपाहियों को आगे बढ़ने से रोक दिया और मंत्रियो को हुक्म किया--"इस सेठ को पाँच गाँव इनाम दे दो।" पुण्य पर भरोसा हो तो ऐसे लाभ हो ! 


प्रश्न-'भाग्य बड़ा है या पुरुषार्थ ? 

उत्तर-'भाग्य का निर्माता पुरुषार्थ है। सांसारिक पदार्थ आदि द्वारा बाँधे हुए कर्मों का फल भोगने में भाग्य की प्रधानता है, लेकिन कर्मों को तोड़ने में, पुण्यानु बंधी पुण्य प्राप्त करने में पुरुषार्थ का प्राधान्य है। धर्मप्रवृत्ति में पुरुषार्थ को नहीं छोड़ना चाहिये l हर एक विचार और प्रवृत्ति में देखना सिर्फ यह चाहिये कि, वह विचार अथवा प्रवृत्ति तीर्थकर भगवन्त के कथनानुसार है या नहीं ! वह सेठ भाग्य की परीक्षा करने गया था। उसके बुरे प्रयत्न का अच्छा परिणाम आया। तो आप भी भाग्य के भरोसे शुभ प्रयत्न क्यों न करें ? फल से कर्म की सत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। कोई उसे प्रारब्ध कहता है; कोई संस्कार कहता है तो कोई अदृष्ट कहता है। 

कुछ दिनों बाद वह सेठ फिर ज्योतिषी के पास गया और उससे अपने ग्रहों के विषय मे पूछा l ज्योतिषी ने कहा-"आपके ग्रह बलवान हैं l आपको कोई बाधा नहीं आ सकती।" सेठ फिर राजसभा में गया l राजा ने उसका सम्मान किया। मगर, उसने राजा का पैर पकड़ कर उसे घसीट कर नीचे पटक दिया। सारी सभा में खलबली मच गयी। सुभट मारने दौडे। इतने में सिंहासन के पीछे की दीवार खिसक पड़ी l यह देखकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ'अहो! यह उपकारी न आया होता, तो आज जरूर दब कर मेरी जान चली गयी होती।' उसने सेठ को दस हजार रुपये इनाम में दिये।

वस्तुपाल-तेजपाल सोने का चरू दबाने जंगल में गये, वहाँ उन्हें एक चरू और मिल गया। यह सब पुण्य का फल है। पुण्य हो तो धन मिले और पाप का उदय आने पर अनेक पीड़ायें और रोग पैदा हो। आजकल कैसे-कैसे यंत्र, हथियार और अणुबम आदि निकले है कि, क्षण भर में लाखों आदमियों का नाश हो जाय ! जैसा भाग्य होता है, वैसे निमित्तों की ओर मनुष्य खिंचता है और दुर्भाग्य के योग से बरबाद होता है।

 6 महीने बाद वह सेठ फिर  ज्योतिषी से अपने ग्रहों का हाल पूछने गया । ज्योतिषी ने फिर वैसा ही आश्वासन दिया। सेठ बाहर से आ रहा था और गाँव के प्रवेशद्वार में प्रविष्ट होने ही वाला था कि, वहाँ उसने राजा को देखा जो कि आज पैदल घूमने निकला था। साथ में कुछ लोग भी थे। राजा ने दरवाजे में घुसते ही सेठ को देखा । वह खुश होकर मिलने आगे बढा, तो सेठ ने उसे ऐसे जोर से धक्का मारा कि वह दूर जा पड़ा और उसके दाँत से खून निकलने लगा । साथ के लोग सेठ की ओर लपके । उधर नगर का जीर्ण प्रवेशद्वार टूट कर गिर गया।  राजा और उसके साथी बच गये। राज सोचने लगा-"यह सेठ कैसा उपकारी है। इसने मुझे तीन बार बचाया है, इसलिए इस बार तो इसे कोई बड़ा इनाम देना चाहिये ।"उसने सेठ को अपना आधा राज्य दे दिया। प्रबल पुण्योदय के समय उल्टे काम भी सीधे पड़ते हैं।



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